जब 32 साल पहले किसानों ने दिल्ली को कर दिया ठप, क्या अब फिर से इतिहास दोहराएंगे किसान

कृषि कानूनों के विरोध में महीने भर से चल रहा किसान आंदोलन अब देखते ही देखते तेज होता जा रहा है। किसान अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने को तैयार नहीं है। वहीं सरकार लगातार किसानों को आश्वासन ही दे रही है. आपको बता दें जहां एक ओर जहां पंजाब और हरियाणा के किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे हुए हैं वहीं देश के अन्य राज्यों गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान में भी किसान केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

किसानों की मांग है कि सरकार इन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करें और उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी दे जिससे कि उन्हें अपनी फसल का सही दाम मिल सके। हलाकि किसान संगठनों और सरकार के बीच कई वार्ताएं हुई हैं। हाल ही में 30 जनवरी के रोज किसान संगठनों और सरकार के बीच वार्ता रखी गई थी जिसमें मुख्य मांगों को लेकर तो सहमति नहीं बन पाई लेकिन पराली और बिजली जैसे कानूनों पर अहम फैसला हुआ।

इसके बाद 4 जनवरी को किसान संगठनों और सरकार के बीच वार्ता होनी है जिसमें देखना होगा कि सरकार किसानों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है। लेकिन किसानों का अपनी मांगों को लेकर साफ कहना है कि जब तक सरकार कृषि कानूनों को रद्द कर उन्हें एमएसपी की गारंटी नहीं दे देती वह इस आंदोलन को जारी रखेंगे।

बता दें कि इससे पहले भी देश का अन्नदाता अपनी समस्याओं को लेकर दिल्ली का घेराव कर चुका है जिसके सामने सरकार को झुकना पड़ा। आज हम आपको देश में चल रहे किसान आंदोलन के बीच से ही 32 साल पहले एक और किसान विद्रोह की तरफ ले चलते हैं जिसमें किस तरह से किसानों ने दिल्ली को ठप कर दिया था।

बोट क्लब पर हल्ला बोल दिल्ली को कर दिया था ठप

आज से 32 साल पहले भी एक ऐसा ही किसान विद्रोह देखा गया जब अन्नदाता ने दिल्ली को ठप कर दिया। बता दें केंद्र में राजीव गांधी सरकार की और तारीख 25 अक्टूबर 1988 को जब अन्नदाता ने सत्ता की बेड़ियों में अपने को जकड़े पाया है तभी उसने बेड़ियों को तोड़कर दिल्ली की तरफ कदम आगे बढ़ाया है।

ऐसा ही नजारा 1988 में देखने को मिला था जब देशभर के किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली पहुंच गए थे। किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में देश भर के किसान बिजली, सिंचाई के दर घटाने और फसल के सही दाम जैसी 35 मांगों को लेकर दिल्ली पहुँचे थे।

बता दें कि जब किसान आगे बढ़ रहे थे तो लोनी बॉर्डर पर पुलिस ने किसानों को रोकने की कोशिश की लेकिन किसान नहीं रुके तो उन पर फायरिंग कर दी गयी जिसमें दो किसान कुटबी के राजेन्द्र सिंह और टिटौली के भूप सिंह की मौत हो गयी थी।

दिल्ली में लग गया था किसानों का जमघट

बता दें कि 32 साल पहले हुए इस किसान विद्रोह में देश भर के 14 राज्यों से 5 लाख किसान दिल्ली पहुंचे थे। ऐसे में सरकारी इमारतों से देखकर पूरी दिल्ली में किसानों का जमघट लग गया था।

उन दिनों स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि को लेकर रैली की तैयारियां चल रही थी जिसमें एक शानदार मंच बनाया गया था लेकिन दिल्ली पहुंचे किसानों ने इस मंच पर भी कब्जा जमा लिया । दिल्ली के वोट क्लब, इंडिया गेट, विजय चौक से लेकर लुटियंस जोन तक के इलाके में किसान ही किसान नजर आ रहे थे।

बता दें कि 32 साल पहले हुए इस किसान विद्रोह में बोट क्लब पर किसानों ने अपनी बैल गाड़ियां और ट्रैक्टर खड़े कर दिए थे जिससे मंत्रियों और अधिकारियों तक के पसीने छूट गए थे। यही नहीं किसानों के इस विद्रोह से पूरी दिल्ली ठप हो गई थी।

अन्नदाता के सामने झुक गई थी सरकार

किसानों के इस विद्रोह से 32 साल पहले दिल्ली रूक गई थी बता दें कि दिल्ली के राजपथ पर सप्ताह भर से ज्यादा तक किसानों का ही कब्जा रहा था लेकिन 30 अक्टूबर की रात दिल्ली पुलिस ने किसानों पर ला’ठीचा’र्ज कर दिया।

जिसके बाद किसान संगठन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने कहा था कि “सरकार ने उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार किया है लेकिन किसान बदला नहीं लेता है वह सब कुछ सह जाता है। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि “किसानों कि नाराजगी सरकार को सस्ती नहीं पड़ेगी।

बता दें कि इसके बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार किसानों के सामने झुक गई थी और किसानों की 35 मांगों को मानने का आश्वासन दिया था जिसके बाद बोट क्लब से लेकर इंडिया गेट ,विजय चौक में चल रहा किसान विद्रोह 31 अक्टूबर 1988 को खत्म हुआ था।

और आप एक बार फिर से देशभर के किसान 32 साल पुराने इतिहास को दोहराने की तैयारी में है। बता दें किसानों ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर सरकार किसानों की मांगों को नहीं मानती है तो नए साल पर वे पूरे देश में विरोध प्रदर्शन करेंगे।

वही अब किसानों का कहना है कि हम 4 महीने तक रोड पर बैठ सकते हैं। हम दिल्ली के 5 मैन एंट्री प्वाइंट्स को बंद करके दिल्ली का घेराव करेंगे। बता दें हाल ही में किसान यूनियन के महासचिव धर्मेंद्र सिंह मलिक ने कहा कि पिछले कुछ समय से देश की सरकारों ने किसान संगठनों की ताकत को हल्के में लेना शुरू कर दिया है।

लेकिन अब इस आंदोलन में किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है ,अब हम दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी बात रखेंगे सरकार अपने इन काले कानूनों को रद्द करे और किसानों को एमएसपी की गारंटी दे अब हम पीछे हटने वाले नहीं हैं।

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