कर्नाटक में हिजाब के बाद अब हो रहा हलाल मीट का विरोध, क्‍या है हलाल मीट और क्‍यो हो रहा है विरोध?

कर्नाटक में हिजाब के बाद अब ‘हलाल मांस’ पर विरो’ध देखने को मिल रहा है, इतना ही नहीं बीजेपी महासचिव सीटी रवि ने तो हलाल मांस को आर्थिक जेहाद तक करार दिया है। ऐसे में हर किसी के मन में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर हलाल मांस है क्या? सवाल ये भी है कि हलाल मांस नहीं तो उसकी जगह पर कौन-सा मांस इस्तेमाल में लाया जाए?

हलाल मांस का विरो’ध कर रहे लोगो का कहना है कि इसकी जगह ‘झटका मांस’ का इस्‍तेमाल होना चाहिए। ऐसे में हलाल और झटका मांस में अंतर अंतर समझना बेहद अहम है।

क्‍या है हलाल मांस और झटका मांस में अंतर?

हलाल एक अरबी शब्द है जिसे इस्लामिक कानून से परिभाषित किया गया है। इस्लाम में हलाल मीट के इस्‍तेमाल की अनु‍मति है, इसमें जानवरों को धाबीहा यानी गले की नस और श्वासनली को काटकर मारना जरूरी बताया गया है।

इसके साथ ही जानवरों को मारते समय उनका जिंदा और स्वस्थ होना भी जरूरी है। हलाल मांस को लेकर बेंगलुरू की जुम्मा मस्जिद के मौलाना मक़सूद इमरान रश्दी ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में ज्‍यादा जानकारी दी।

उन्‍होंने कहा कि हलाल इसलिए किया जाता है कि ताकि गर्दन के चारों ओर की नसें कट सके और जानवर का ख़ून बह जाए। उन्‍होंने कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने कहा है कि अगर मांस के भीतर ख़ून सूख जाए तो ये कई बीमारियां का कारण हो सकता है।

ऐसे में अगर एक बार मांस से सारा ख़ून बह जाए तो उसे खाने पर इंसान को बीमारी नहीं हो है, इसे ही ज़बीहा कहते हैं। मौलाना रश्दी के मुताबिक ज़बीहा के लिए जानवर को फ़र्श पर लिटा ‘बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर’ पढ़ कर फिर उसका गला कटा जाता है।

क्‍या है झटका विधि?

उन्‍होंने आगे कहा कि इस दौरान नस को ऐसे काटा जाता है कि सिर और धड़ अलग न हो, ताकि शरीर का सारा ख़ून बह कर निकल सके। मुस्लिम समुदाय में इसी मांस को खाया जाता है। इसे ‘झटका’ की तुलना काफी दर्दनाक माना जाता है।

वहीं झटका मांस की बात करें तो इसमें “सिर और धड़ तुरंत अलग हो जाते हैं।” इस विधि में जानवर की रीढ़ पर तेजी से प्रहार करते है, जिससे उसकी मौ’त तुरंत हो जाती है।

कहा जाता है कि झटका विधि में जानवर को काटने से पहले शॉक देकर उसके दिमाग को सुन्न कर दिया जाता है, जिससे वह ज्‍यादा संघर्ष न करे। हिंदू और सिख समुदाय के मांसाहार करने वाले लोग ‘झटका’ मीट खाते हैं।