पाई-पाई को त‍रसते थे पंकज त्रिपाठी, कहा- लगता नहीं कभी खरीद पाऊंगा फैंसी कार

सुपरस्‍टार पंकज त्रिपाठी आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है, आज वह एक जाने-माने और सफल एक्‍टर है जो लाखों रूपए की फीस लेकर काम करते हैं। लेकिन त्रिपाठी के लिए वक्‍त हमेशा से ऐसा नहीं था। आज करोंड़ों की संपत्ति के मालिक बन चुकी त्रिपाठी को अपने बचपन में बड़ी मुश्किल से ही पैसा देखने को मिलता था। एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा कि वो कभी नहीं सोचते थे कि वह बड़ा घर या फैंसी कार खरीद पाएंगे।

‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘सिंघम रिटर्न्स’, ‘दबंग 2’, ‘बच्चन पांडे’ और वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ जैसी लोकप्रिय फिल्‍मों और सीरीजों में पंकज त्रिपाठी अपने अभिनय से हर किसी को अपना दिवाना बना चुके हैं।

खुश रहने के लिए अधिक पैसों की जरूरत नहीं

वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ ने पंकज को काफी लोकप्रिय बनाया, इसमें वह लीड रोल में थे। हाल ही में पंकज ने टाइम्स ऑफ इंडिया को एक इंटरव्यू दिया।

पंकज ने कहा कि मैं एक हंबल बैकग्राउंड से आता हूं। मैं अपनी पत्‍नी के साथ कई साल पहले मुंबई आया था, लेकिन हमने कभी लाइम-लाइट वाली जिदंगी की जरूरत महसूस नहीं की।

उन्‍होंने आगे कहा कि मुझे नहीं लगता कि मैं एक फैंसी कार या एक बड़े घर के लिए कभी भी भारी लोन ले सकता हूं। मैं बिहार के एक दूर-दराज के गांव में पला-बढ़ा एक किसान का बेटा हूं।

मेरे घर में टीवी नहीं था। मैं पैसे की कीमत को समझते हुए बड़ा हुआ। उन्‍होंने आगे कहा कि मुझे नहीं लगता कि मेरा नजरिया भौतिक संपन्नता को लेकर जल्द ही कभी बदलेगा।

मेरा हमेशा से ऐसा मानना हैं कि जीवन में खुश रहने के लिए, आपको अधिक पैसे की जरूरत नहीं होती हैं। मेरे पास जो कुछ भी होता हैं, मैं उसी में खुश रहने का प्रयास करता हूं।

स्ट्रगल में पत्नि ने दिया साथ

बता दें कि इससे पहले पंकज ने पिछले साल अमिताभ बच्‍चन के साथ ‘कौन बनेगा करोड़पति 13’ के एक एपिसोड में बातचीत के दौरान कहा था कि मैं मुंबई साल 2004 में आया था और 2012 में मैंने गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्‍म में काम किया था।

कई बार लोग पूछते हैं कि आप इन आठ सालों के संघर्ष के दिनों में क्‍या कर रहे थे। तब मुझे एहसास होता है कि ओह, तो वो मे‍रे स्ट्रगल के दिन थे?

दरअसल उस दौर में मुझे लगा ही नहीं कि यह एक कठिन दौर था। मुझे कठिनाई का एहसास ही नहीं हुआ था, मेरी पत्नी बच्चों को पढ़ाती थी, हम छोटे घर में रहते थे और हमारी जरूरतें सीमित थीं। वे कमाती थीं तो हम आसानी से रहते थे। मुझे अपनी पत्नी की वजह से अपने संघर्ष के दिनों में अंधेरी स्टेशन पर नहीं सोना पड़ा था।